World Mental Health Day: लगातार थकान, चिड़चिड़ापन और काम में मन न लगना कहीं डिप्रेशन के संकेत तो नहीं? डॉक्टर गौरव गुप्ता से समझें स्ट्रेस, डिप्रेशन और बर्नआउट का फर्क

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World Mental Health Day: लगातार थकान, चिड़चिड़ापन और काम में मन न लगना कहीं डिप्रेशन के संकेत तो नहीं? डॉक्टर गौरव गुप्ता से समझें स्ट्रेस, डिप्रेशन और बर्नआउट का फर्क

World Mental Health Day: लगातार थकान, चिड़चिड़ापन और काम में मन न लगना कहीं डिप्रेशन के संकेत तो नहीं? डॉक्टर गौरव गुप्ता से समझें स्ट्रेस, डिप्रेशन और बर्नआउट का फर्क

दिल्ली के सीनियर साइकेट्रिस्ट और तुलसी हेल्थकेयर के सीईओ डॉ. गौरव गुप्ता बताते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य के शुरुआती संकेत अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। अगर ये लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा रहें तो विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर बहुत से लोग मानसिक सेहत के बारे में बात करते हैं, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे-छोटे बदलावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। बिना ज्यादा काम किए भी थकान महसूस होना, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाना या उन चीजों में दिलचस्पी खत्म हो जाना जिन्हें पहले मजा आता था—ये सब सिर्फ ‘काम का दबाव’ या ‘नींद की कमी’ नहीं हो सकते।

दिल्ली के तुलसी हेल्थकेयर के सीईओ और सीनियर साइकेट्रिस्ट डॉ. गौरव गुप्ता कहते हैं कि ये बदलाव कई बार डिप्रेशन या एंग्जायटी के शुरुआती संकेत होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मानसिक स्वास्थ्य को हल्के में लेना बाद में व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों जिंदगी को प्रभावित कर सकता है।


लगातार थकान और चिड़चिड़ापन कब खतरे की घंटी है? 

डॉ. गौरव गुप्ता के अनुसार, लगातार थकान रहना, चिड़चिड़ापन बढ़ना, ध्यान लगाने में दिक्कत होना और पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में रुचि कम हो जाना—ये लक्षण डिप्रेशन या एंग्जायटी की शुरुआत हो सकते हैं। लेकिन हर बार इनका मतलब मानसिक बीमारी नहीं होता। नींद की कमी, पोषण की कमी, हार्मोनल बदलाव या कोई शारीरिक बीमारी भी इनकी वजह बन सकती है।

अगर ये लक्षण दो हफ्ते या उससे ज्यादा समय तक बने रहें, रोजमर्रा के काम प्रभावित करने लगें या धीरे-धीरे बढ़ते जाएं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। शुरुआत में ही पहचानने से समय पर मदद और सही इलाज संभव हो जाता है।


स्ट्रेस और डिप्रेशन में फर्क कैसे समझें?

बहुत से लोग स्ट्रेस और डिप्रेशन को एक ही चीज समझ लेते हैं। डॉ. गौरव गुप्ता इस भ्रम को साफ करते हैं।

स्ट्रेस आमतौर पर बाहरी दबाव से पैदा होता है—काम की डेडलाइन, पैसे की चिंता, परिवार की जिम्मेदारियां या कोई अचानक आई समस्या। परिस्थिति बदलने, आराम मिलने या किसी के सहयोग से स्ट्रेस अक्सर कम हो जाता है।वहीं डिप्रेशन में लंबे समय तक उदासी, निराशा, किसी भी काम में रुचि न रहना और ऊर्जा की कमी जैसे लक्षण दिखते हैं। नींद और भूख में भी बदलाव हो सकता है। ये लक्षण कम से कम दो हफ्ते तक बने रहते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगते हैं।

डॉ. गुप्ता बताते हैं कि लंबे समय तक अनियंत्रित स्ट्रेस डिप्रेशन की वजह भी बन सकता है, लेकिन दोनों एक नहीं हैं। अगर लक्षण संभालने से बाहर हो जाएं तो जांच और सलाह जरूर लें।


हर समय थकान रहना कहीं बर्नआउट तो नहीं?

सामान्य थकान अच्छी नींद, आराम या छोटे ब्रेक से कम हो जाती है। लेकिन लंबे समय तक काम या जिम्मेदारियों के दबाव में रहने से बर्नआउट हो सकता है।

डॉ. गौरव गुप्ता के अनुसार बर्नआउट के संकेत हैं:

  • लगातार थकान जो आराम के बाद भी नहीं जाती
  • चिड़चिड़ापन और काम करने की क्षमता में कमी
  • ध्यान लगाने में दिक्कत
  • भावनात्मक रूप से दूसरों से कटाव महसूस करना     
  • रोज के कामों को लेकर नकारात्मकता या बेबसी बढ़ना
  • अगर इन संकेतों को नजरअंदाज किया जाए तो रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं, कामकाज पर असर पड़ सकता है और पूरी सेहत बिगड़ सकती है। इससे बचने के लिए काम और निजी जिंदगी के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करना, नियमित ब्रेक लेना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी है।


    मानसिक सेहत बेहतर रखने के 5 आसान आदतें

    डॉ. गौरव गुप्ता रोजमर्रा की कुछ छोटी आदतों को अपनाने की सलाह देते हैं, जो मानसिक सेहत को मजबूत रखने में मददगार साबित होती हैं:

  • नींद का समय तय रखें
    रोज एक ही समय पर सोने और उठने की कोशिश करें। हर रात सात से नौ घंटे की नींद का लक्ष्य रखें। अनियमित नींद मूड और एकाग्रता दोनों को प्रभावित करती है।
  • शारीरिक गतिविधि जरूर करें
    रोज कम से कम 20-30 मिनट कोई शारीरिक गतिविधि करें। पैदल चलना भी पर्याप्त है। व्यायाम से शरीर में एंडोर्फिन रिलीज होते हैं, जो मूड बेहतर करते हैं।
  • संतुलित आहार और पानी
    डाइट में पौष्टिक और संतुलित भोजन शामिल करें। शरीर में पानी की कमी न होने दें। खान-पान का सीधा असर ऊर्जा स्तर और मूड पर पड़ता है।
  • स्क्रीन टाइम कम करें
    खासकर सोने से पहले मोबाइल या दूसरी स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल करने से बचें। काम के दौरान भी बीच-बीच में ब्रेक लें। ज्यादा स्क्रीन टाइम नींद और मानसिक शांति दोनों को नुकसान पहुंचाता है।
  • करीबी लोगों से जुड़े रहें
    परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी भावनाओं के बारे में खुलकर बात करें। माइंडफुलनेस या गहरी सांस लेने का अभ्यास तनाव संभालने में मदद करता है।  

     कब विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी है?

    डॉ. गौरव गुप्ता स्पष्ट करते हैं कि अगर थकान, चिड़चिड़ापन, निराशा या किसी काम में रुचि की कमी लंबे समय तक बनी रहे और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो इसे सिर्फ ‘सामान्य तनाव’ मानकर टालना गलत है। इन लक्षणों की असली वजह समझने के लिए विशेषज्ञ से सलाह लें। समय पर मदद लेने से समस्या को जल्दी पहचाना जा सकता है और जरूरी इलाज शुरू हो सकता है।

    मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना बड़ी कीमत चुका सकता है। छोटे-छोटे बदलावों पर ध्यान देना और जरूरत पड़ने पर मदद मांगना ही सही रास्ता है। डॉ. गौरव गुप्ता जैसे विशेषज्ञों की सलाह मानकर हम अपनी और अपने आसपास के लोगों की मानसिक सेहत का बेहतर ख्याल रख सकते हैं।

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